राष्ट्रीय कबि चौपाल।बीकानेर

 राष्ट्रीय शायरी पर --14 जून 25

कुछ शेर सुनाऊंगा उससे पहले थोड़ा सा 2 मिनट के लिए मेरी कविता लिखने की शुरुआत के बारे में बताना चाहूंगा जैसा कि हम सब जानते हैं कि आधुनिक हिंदी कविता के जनक हीरानंद सच्चिदानंद आपसे जी की रचनाएं कुछ कविताएं अपने कॉलेज के दोनों में पड़ी थी जिसे वह खूब प्रभावित हुआ प्रेरित हुआ और उसे दौर में खूब सारी रूमानियत भारी और तुकांत कविताएं भी लिखिए जो अभी मेरी डायरी में कहीं चेंज कर रखी है जो सबसे अधिक काम मुझे पसंद है उनकी दो पंक्तियां जिसमें वह सीधे-सीधे शहरी जीवन और बढ़ते हुए आदमी की कारण पर प्रकाश करते थे कि ऐसा तुम अभी सबवे तो नहीं हुए ना ही नगर में बसा तुम्हें आया फिर कहां से सिक्का डसना और यह जहर कहां से करें उसे जमाने में कवियों की दृष्टि छोटी-छोटी बातें को लेकर कुछ भी लिख देते थे जो आदमी कविता बन जाती थी जैसे कोई ठीक है थोड़ा जैसे कोई मां अपने बच्चों को चांद दिखाई है जो अपने बच्चों को रोटी नहीं दे सकती दे सकती तो वह चांद दिखा करके आती है की बेटा नहीं

अभी उठा भी न पाए थे अंगडाई लेके हाथ -- अभी उठा भी न पाए थे अंगडाई लेके हाथ

देखा मुझे तो........( सामने छत पर ) देखा मुझे तो  छोड़ दिए मुस्कुरा के हाथ ...

इश्क --मोहब्बत –  – वफा--- इबादत  अब मिलती है  सिर्फ किस्सों में 

इश्क --मोहब्बत –  – वफा--- इबादत  अब मिलती है  सिर्फ किस्सों में 

जफ़ाओ ने हर मोड़ पर पहरे लगा रखे है........ जफ़ाओ ने हर मोड़ पर पहरे लगा रखे है........

चंद अशआर  पेशे नजर है ------------------

तुमने आँखों में मेरी ---------- देखा जबसे – 

सपने कितने ही( जाग उठे ) तबसे ....सपने कितने ही  जाग उठे तबस

मेरी तन्हाई का सबब उनसे (मुझसे) पूछो 

मेरी तन्हाई का सबब उनसे पूछो 

वो जो कोने में जाके बैठे है -- वो जो कोने में जाके बैठे है ....

तेरी  आँखों में नमी सी क्यूँ है 

तेरी आँखों में नमी सी क्यू है 

(क्या)  फिर कोई  धोखा पाया तुमने 

एक और शेर है --

------ एक और 

तुम किसी और के हो जाओ ये गम नही मुझको -- तुम किसी और के हो जाओ ये गम नही मुझको – 

(बस करो – अब तो मेरे ख्वाबो में आना छोड़ दो ) 

बस -----------------मेरे ख्वाबो में आना छोड़ो – मेरे मेरे ख्वाबो में आना छोड़ो 

सुर्ख रंग से हो गई है दहशत – 

सुर्ख रंग से हो गई है दहशत

जबसे पहना है लाल जोड़ा उसने – जबसे पहना है लाल जोड़ा उसने  

अंत में 

वफा के जिक्र से –अब तो दिल डरता है 

जब से मारा है दिल पे –जब से मारा है दिल पे खंजर उसने ..........















 







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