कोई गंगा जी आता है #GZ जो कोई हरिद्वार आता है वो मन की पा ही जाता है... भगीरथी के तट पर उसका हर दुख तर ही जाता है.. ये माँ गंगा है जो सदियों से हमारे दिल पे छाई है -- जो सगर के पुत्रों को मुक्ति देने -शिव की जटाओं से भगीरथ जी के तप से ही तो इस पुण्य धरा पे आई है ।। पतित पावनी मां गंगा कही मंदाकिनी, कहीं अल्कनन्दा तो कही जान्हवी कहलाई है जो युगों से हमारे मन को पवित्र करती आई है ... परन्तु हम ही है जो इसका उपकार विस्मृत करके भूले है तभी तो जगह जगह इसके तट पर भी होटल रिसोर्ट खोले है ... ये लालच लोभ की अंतहीन दौड़ में मानव अंधा होता जाएगा फिर इस मानवता को कोई न बचा पायेगा हमारे धर्म पर तो भी खतरा ही मंडराएगा .. इधर हमारे GZ के बारे में दो शब्द -- घुमक्कड़ी की मशाल हमारे नीरज भाई जलाए है हर पहाड़ और पर्वत पर GZ का ध्वज फहराए है नमामि गंगे -चंडी घाट पर आज घुमकड़ो की फौज आई है जो हंसते गाते हए गुनगुनाये जा रही है ...
जो कोई हरिद्वार आता है वो मन की पा ही जाता है हमारे आश्रम में आके वो गुरु किरपा पा ही जाता है ये पावन धरा है कनखल की जहां पर दक्ष विराजे है जहां पर सती कुंड में सत्य का डंका बाजे है।। (इसी कनखल में परम् पूज्य गुरुदेव परमहंस स्वामी श्री विष्णु देवानन्द गिरिजी महाराज ने ज्ञान की गंगा बहाई थी) --- ये पावन धरा है कनखल की जहां पर दक्ष विराजे है जहां पर सती कुंड में सत्य का डंका बाजे है।। इसी कनखल में गुरुजी ने ज्ञान की ज्योत जलाई थी उसी ज्योति से प्रकाशित पूज्य गुरुदेव विराजे है ( उनके राम और कृष्ण सदृश्य शिष्य परम् आदरणीय ,परम् श्रधेय, अर्चनीय वंदनीय महत स्वामी श्री रामानन्द गिरी जी और स्वामी कृष्ण नंद गिरी जी) इसी कनखल में गुरुजी ने ज्ञान की ज्योत जलाई थी उसी ज्योति से प्रकाशित पूज्य गुरुदेव विराजे है हमारे गुरूद्वय ने ऐसी तप की अलख जगाई है जो दूर दूर से इतने पूज्य सन्तो को ले आई है --हम भी दर्शन के इनके भक्ति में खो गए है इनकी उपस्थिति से ही धन्य हो गए है ये शिव भोले की कृपा है और मां गंगा का ...
राष्ट्रीय शायरी पर --14 जून 25 कुछ शेर सुनाऊंगा उससे पहले थोड़ा सा 2 मिनट के लिए मेरी कविता लिखने की शुरुआत के बारे में बताना चाहूंगा जैसा कि हम सब जानते हैं कि आधुनिक हिंदी कविता के जनक हीरानंद सच्चिदानंद आपसे जी की रचनाएं कुछ कविताएं अपने कॉलेज के दोनों में पड़ी थी जिसे वह खूब प्रभावित हुआ प्रेरित हुआ और उसे दौर में खूब सारी रूमानियत भारी और तुकांत कविताएं भी लिखिए जो अभी मेरी डायरी में कहीं चेंज कर रखी है जो सबसे अधिक काम मुझे पसंद है उनकी दो पंक्तियां जिसमें वह सीधे-सीधे शहरी जीवन और बढ़ते हुए आदमी की कारण पर प्रकाश करते थे कि ऐसा तुम अभी सबवे तो नहीं हुए ना ही नगर में बसा तुम्हें आया फिर कहां से सिक्का डसना और यह जहर कहां से करें उसे जमाने में कवियों की दृष्टि छोटी-छोटी बातें को लेकर कुछ भी लिख देते थे जो आदमी कविता बन जाती थी जैसे कोई ठीक है थोड़ा जैसे कोई मां अपने बच्चों को चांद दिखाई है जो अपने बच्चों को रोटी नहीं दे सकती दे सकती तो वह चांद दिखा करके आती है की बेटा नहीं अभी उठा भी न पाए थे अंगडाई लेके हाथ -- अभी उठा भी न पाए थे अंगडाई लेके हाथ देखा मुझे तो........( स...
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