यात्रा 22 जून24

 यात्रायें

यात्रायें - अंतर्मन में स्व की खोज

कुछ लोग यात्रा करने के लिए पैदा होते हैं और बस घूमने का आनंद लेते हैं। इसका मतलब यह नहीं है कि वे खो गए हैं और बिना उद्देश्य के हैं। बल्कि वे तो है ही स्व की खोज में ,यात्राएं तो बहाना है ।दो तीन दिन से सोच रहा था के क्या लिखूं कहाँ से शुरु करू फिर कल मुक्ता जी ने समय सीमा भी दे दी ,
इसी पर अभी कुछ पंक्तियां दिल से निकली जो आपके साथ शेयर कर रहा हूं :-
यात्राओं के पल है 
हर किसी के अपने हिस्से ,
उनके कल के ,किसी के परसो
औऱ किसी के  है बरसो पुराने  किस्से ।
मेरा भी ऐसा ही कुछ था सपना
स्कूल  से आकर पड़ता मैं जब
कमलेश्वर की कश्मीर यात्रा
और रांगेय राघव की यायावरी
और दुर्गम यात्राओं का वर्णन ...
उतर आता आंखों के समक्ष सारा चित्रण।
  मैं कब जाऊँगा कहाँ जाऊंगा
बस यह सवाल हमेशा प्रश्नचिन्ह छोड़ जाता।
वो था साल एक बचपन का
जब मौका मिला पहली नीलकंठ की यात्रा का
नानाजी के संग  ,
वो प्रदुषण रहित आसमान
मस्त ठंडी बयारों के सग अपनी जीप
की वो यात्रा आज भी याद आती है ,
और गरुड़ चट्टी के मीठी नीम के पकौड़ो की
याद तो आज भी गुदगुदा जाती है ।
   हकीकत यही है के
आर्थिक अभावों से
सारा बचपन ओर युवावस्था अलग अलग यात्राओं के बस  किस्से पढ़ते  ही बीता ...
फिर
ईश्वर भी सुनता है ,
नौकरी और बीवी मिली
और खुला एक नया आसमा ,
पर बरसो के सोए सपने
भी कहाँ जल्दी से जगते है
वो भी टूट न जाये इसलिये डरते है ।
अब तो GZ ही मेरी प्रेरणा बन आया है ,
जिसमे
मुक्ता जी ,प्रज्ञा जी और शालिनी जी का
जहूर सब और छाया है
नीरज जी की छवि तो कभी न भूलने वाली है
वहीं 
  गोविंद अग्रवाल जी के राष्ट्रीय सोफे ने भी  गज़ब ढाया है ...
घुमक्कड़ी की प्रेरणा तो अंतर्मन से आती है
कोई किताब कोई किस्सा
जब  मन को छू जाता है ,
वहीँ मनुष्य बन यायावर
एक यात्री बन निकल जाता है
उन पहाड़ो उन वादियों की और
जो हमेशा से हमे पुकारती रही हैं ।
जब भी कोई उन गहरे नीले समुन्द्रों और
गगनचुम्बी पहाड़ो
और गहरी घाटियों को छू लेता है
तभी घुमक्कड़ी का एक नया किस्सा भी जन्म लेता है ...नया किस्सा भी जन्म लेता है
22.06.2024
12.29 AM


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