परछाईया 26 मार्च 2012
26.03.2012
At PTC Saharanpur
परछाइयो में बनती जानी अनजानी
आकृतियां
कभी हंसती कभी गाती कभी ह्रदय को
गुदगुदाती है
धीरे धीरे नाचते गाते दिल मे उतरती जाती है
ह्रदय को भरमा कर परछाइयां
फिर
अगणित परछाइयों का जाल बुनती चली जाती है
वाह ,रे मानव मन , समय चक्र में उलझ
उन आकृतियों से रिश्ते बना ,
उन्ही में खो जाता है ।
मुस्कुरा कर जिंदगी जिये जाता है ..
पर
भ्रम ...क्षणभंगुर पानी के बुलबुले सा
अनायास ही टूटता है
भोर के सपने सा -टूटा दिल भी तड़पता है ।
देख
उन आकृतियों को
बिछुड़ते --फिर व्याकुल हो रोता है ,
आकृतियां
जो के
मात्र परछाइयां है
औ परछाइयां कब अपनी हुई है ...
वो तो मात्र प्रतिबिंब है मस्तिष्क की
कल्पनातीत इच्छाओं-वासनाओ का
जिन्हें
मन पाने को आतुर --व्याकुल हो
छटपटाता है
और फिर से
परछाइयों के खेल में
उलझता चला जाता है
उलझता चला जाता है
कभी न निकलने के लिए . ।
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