कविता बीकाणा पर 29-04-25
बीकाणा - 29 अप्रेल 2025
बीकानेर की धरती पर अभी हम आके बैठे हैं इस माटी की खुशबू को हम अपना ही बैठे हैं यह धरती है शहीदों की
जहां कुर्बानियां हुई हुई है
इस धरती के समक्ष आकर शीश झुका ही बैठे हैं ....
बड़े-बड़े मूर्धन्य लेखक ,कवि , साहित्यकार हास्य रस , वीर रस के कवि और अद्भुत श्रोता में यहां पर विराजमान है तो मेरे दिल के भाव आपको कहना चाहूंगा
//जहां जूनागढ़ से तोपों की आवाज गूंजती थी अब मां करणी के मंदिर की झंकार गूंजती है अब बम बम भोले के जयकारे
हर और छाए हैं
इन मधुर तानो में हम सब मुस्कुराये है ...
और अंत मे
क्या तेरा है ---क्या मेरा है ---
यहां सब खो ही जाना है
क्या साथ लेके आये थे -जो अब लेके जाना है
ये दुनिया है स्वार्थ की
इसे तो अपने मन की है
फिर काहे का घबराना है
कौन किसी के साथ है
कौन है बरख़िलाफ़
अब आईने से भी हमने
तो
सच उगलवाना है !!
पर बेचारा आईना ...
चेहरे .....कितने ?
आईना तो घबरा उठा
क्या दिखाऊ क्या छुपाऊँ
इंसान की फितरत के कितने उघड़े चेहरे है ,
लेकिन आशा .... है
पर
दिन वह दूर नही है
जब उजाला छाएगा
और
इंसान के अंदर का
इंसान बाहर आएगा ,
उससे मिलकर इंसान भी
मनुष्य बन जायेगा ,
इंसान भी मनुष्य बन जायेगा .. .
टिप्पणियाँ
एक टिप्पणी भेजें