सफर जिंदगी का कविता 2
सफर जिंदगी का - 2
सरपट चलती जिंदगी
मानो हो छुक छुक ट्रेन का सफर ,
चलते पेड़
उड़ते बादल
बहकती हवाये
मचलती घटाए
बदलते चेहरे - भटकते लोग -
सफर लाजवाब ,
न जाने किस और ले जाये
सफर अंतहीन -और चलायमान
करिश्मे कुदरत के बिखरे है बेहिसाब।।
कही कोई पक्षी चहका
कही कोई कोयल कुहकी
झकृत कर ह्रदय के तारो को
ये किसकी पायल खनकी
कवि की कल्पना है या
शब्दो की उड़ान
कुछ तो है जो मन बगिया
फूलों की खुशबू से महकी ।।
ओ साथी चल
लेके मुझे भी
झील के उस पार
जहां धरा आकाश मिलते है
ज्यो मिलते है बिछुड़े प्रेमी दो...
फिर
निकल जाएं यात्रा पर
शुरू कर एक नया
सफर जिंदगी का
छोड़ संग स्वार्थी सम्बंधो का
बस एक हो
निकल चले सुदूर पर्वतों के पार
दूर गगन की पुकार
ये
पुकार जब घनीभूत होगी
तब ही निकलेगी
ह्रदय से तरंग
बजेगा अनहद नाद
जो एकाकार हो -
ट्रेन के संग
लेके जायेगा
मंजिल की और
वहीं तो सफर की मंजिल है
निर्विकार निर्विचार हो
हो जायेगे
जब
उस ॐ से एकाकार
हो जाएंगे जब उस ॐ से एकाकार
तभी पूर्ण होगा ये
जिंदगी का सफर
ये जिंदगी का सफर
(ट्रेन जोधपुर की और -21.06.25/1840)
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