शायरी 5 अप्रेल 25

 शायरी गीत ग़ज़ल 5 अप्रेल 25


वह कहते हैं कि आओ जख्मों पर मरहम लगा दे 

दर्द देते हैं मगर -- तड़पने भी नहीं देते

एक तीर दिल में गढ़ गया नश्तर  बनकर 

आहें  देते हैं मगर रोने भी नहीं देते ।

ध्यान चाहूंगा -- आह निकले और वाह निकले-

वो सर्द  शामों में उनका मेरे शाने  से लगना

  तन्हा रातों में उनका (वो)चुपके से मिलना ख्वाब देते हैं मगर जगने  भी नहीं देते -2

वक्त रुखसत मेरी आंखें नम थी 

वो खामोश वादियाँ  भी गुमसुम थी 

अब  वीरानियों में कौन आएगा

 गीत वफाओं के कौन गाएगा

वे कहते हैं कि तुम  कल फिर आना 

अभी जख्मों का बाकी है कुछ हिसाब पुराना

इज़ तरह

 जमाने से वफा का नाम गुम जाएगा

 फिर कोई ना श्री फरहाद के किस्से गाएगा ।

तुम तो खुश रहो अपनी जन्नत में

 खूब गाओ गीत तरन्नुम में 

हम तो बैठ के आसमान तकते 

कि उसका चेहरा एक बार नजर आए

 जिंदगी का कोई सहारा बन जाए

वरना तो अब जिस्म ही बाकी है

जान तो चली गई

फिर भी आस बाकी है 

5न





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