ग़ुरबत और कीमत अहमदाबाद प्लेन क्रैश कविता

 

गुरबत और कीमत -
22 जून 25   07.18  am जोधपुर
(12 जून अहमदाबाद प्लेन क्रैश हादसे में दिवंगत यात्रियों को दो-दो करोड रुपए एयर इंडिया द्वारा व अन्य द्वारा भी कई करोड़ की घोषणा की गई जबकि बस ,ट्रेन आदि दुर्घटना पीड़ितों के क्लेम काफी कम होते है तो  मन में कुछ विचार प्रकट हुए जो आपसे साझा कर रहा हूं)
पंछियों की परवाज
आसमाँ की बुलन्दी
हवाओं के  संग
गगनचुंबी बादलों को चीर ,
पहुंचाने को उस पार....
हंसते खिलखिलाते
खुशियो के गीत गाते
सब जाते अपनो के पास ..
परन्तु 
नियति  का क्रूर क्रंदन कौन रोक पाया ,
पल में ही उस वायुदूत को
अर्श से फर्श पर ला
जलता हुआ अग्नि कुंड बनाया ,
चुप मौन सन्नाटा
और मच गया हाहाकर चहु और ,
शून्य से प्रगटे
राख में सिमटे
बस यही है -
बस यही है जीवन की डोर
और हमारी
क्षण भंगुर जिंदगी का मोल.. 
पर हाँ
जरा
रुकिये
ठहरिए -
मोल लगना तो अभी बाकी है
गरीबे गुरबा जो मुफलिसी में जीते है
वो तो बस फाकाकशी करते है
उनकी क्या कीमत ,
उनकी जान कहाँ अनमोल ,
उन्हें चाहे
बस कुचले या ट्रेन रौंदे
ले लो लाख पचास हजार
पर
हवाई परिंदों के तो है आब जड़े ,
वो कब ग़ुरबत में पड़े
तो भाई  लो 2 करोड़
अभी और भी  देने की लगी है होड़ ,
क्योकि फकीरों को  बस नारे मिले
औऱ मिली तकरीरे
तुम्हे रहना है मुफलिसी में
तुम्हारी कहाँ हाथों में लकीरे ,
जान तो सबकी ही कीमती
सब है अपनी अपनी मां का दुलारे
और बीवी बच्चों के प्यारे,
फिर ये भेदभाव क्योँ करे ,
कौन आये औऱ
जो  इस "सिस्टम "को ललकार करे
जो इस युग मे
ओ "मिडल क्लास "
तुम्हारी नैया पार करे ....

-------/-/
फ़िक्र-ए-ग़ुर्बत है न अंदेशा-ए-तन्हाई है
ज़िंदगी कितने हवादिस से गुज़र आई है

लोग जिस हाल में मरने की दुआ करते हैं
मैं ने उस हाल में जीने की क़सम खाई है

हम न सुक़रात न मंसूर न ईसा लेकिन
जो भी क़ातिल है हमारा ही तमन्नाई है

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